शिक्षा समाज की एक ऐसी ज़रूरत है जिसकी पूर्ति पैसों के बल नहीं की जा सकती।चाहे बात हो समुद्र में गोते लगाने की या आसमान में उड़ने की, शिक्षा के बिना आज मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता है।यह शिक्षा ही है जो मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाता है।लेकिन आज शिक्षा की पद्धति व पढाने के तौर तरीकों में काफी परिवर्तन आ गया है।पहले जहाँ शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन करना था वहीं आज के परिदृश्य में यह केवल आजीविका के लिये अनिवार्य साधन हो गया है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के एक अध्ययन के मुताबिक दुनियां भर में करीब चार अरब लोग साक्षर हैं तथा 77.5 करोड़ लोग निरक्षर हैं।निरक्षर लोगों में से दो तिहाई महिलाएं हैं।यानि महिलाएं आज भी उन पुरानी परंपरा से आगे नहीं बढ़ पायी है जो कि चिंता का विषय है।
अगर भारत की बात करें तो 2011 में किये गए सर्वेक्षण के मुताबिक साक्षरता दर 74.4% है जिसमे पुरुष साक्षरता दर 82.16% एवं महिला साक्षरता दर 65.46% है।
एक अनुमान के अनुसार भारत में करीब 28.7 करोड़ लोग पढ़ना लिखना नहीं जानते हैं जो कि विश्व के आबादी का 37% है।यह आंकड़े साफतौर से भारत की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल रहा है।
आज भारत में शिक्षा की गुणवत्ता में भी भारी कमी आ गयी है जिसका सर्वप्रमुख कारण शिक्षा का बाजारीकरण है।आज गली मुह्हलों में किराने की दुकान से ज्यादा शिक्षण दुकान मिल जाते हैं।देश में न जाने कितने प्राइवेट संस्थान ऐसे हैं जिनका सिर्फ एक मकसद लोगों की जेब काटना है। विभिन्न प्रकार के प्राइवेट संस्थान अपने भ्रामक विज्ञापन के ज़रिये लोगों को अपने जाल में फंसाती है।इनमे इंजीनियरिंग और मेडिकल के संस्थान प्रमुख हैं ये संस्थान भ्रम का घटाटोप पैदा कर लोगों को लूटने का काम करती है।शिक्षण संस्थानों में यूँ शिक्षा का हो रहे व्यापार को रोकने के लिए सरकार को कोई ठोस कदम उठानी चाहिए और साथ ही विभिन्न प्रकार के कोर्स के लिए भिन्न भिन्न तरह के मानक राशि तय कर देनी चाहिए ताकि प्राइवेट संस्थानों में हो रहे लूट को कम किया जा सके और शिक्षा की हो रही बाजारीकरण में सेंध लगाया जा सके।
Saturday, February 27, 2016
आज के दौर में शिक्षा
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