भोपाल से 191 किमी दूर उज्जैन में इस बार आस्था का महापर्व 'कुम्भ' लगा है। इस महाकुम्भ में लगभग पंद्रह हजार नागा व साधू संत सम्मिलित हुए हैं।शुक्रवार को प्रथम शाही स्नान के साथ ही सिंहस्थ महाकुम्भ का आगाज हो गया।तक़रीबन 10 लाख लोगों ने अमृतमयी क्षिप्रा में पहला शाही स्नान किया। इस महाकुम्भ में 13 अखाड़ों के साधु संत हिस्सा ले रहे हैं।
मोक्षदायिनी क्षिप्रा में एक डुबकी लगाने के लिए लाखों लोगों का हुजूम उज्जैन की धरती को सुशोभित कर रहा है।
अगर बात करें प्रसाशनिक चाक-चौबंद की तो वह काबिल-ए-तारीफ है। भोपाल से लेकर उज्जैन तक बहुत कड़ी सिक्योरिटी है। चप्पे चप्पे पर पुलिस की पैनी नज़र है।
महाकाल की नगरी उज्जैन में "हर हर महादेव" की गूंज से मेरे कान तृप्त हो रहे थे। यहाँ की प्रत्येक वस्तु शिव के भक्ति में लीन नजर आती है। माँ क्षिप्रा के तट पर आठ मुख्य घाट हैं - त्रिवेणी घाट, रामघाट,मंगलनाथ,गऊघाट,भूखीमाता,सिद्धवट घाट,नृसिंह घाट एवं ऋणमुक्तेश्वर। सभी घाटों की अपनी अपनी विशेषता है।
घाटों पर सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैराकी बल भी तैनात किये गए हैं।इतना ही नहीं सभी घाटों पर एक निश्चित सीमा के अंतराल पर बैरियर लगाये गए हैं ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना न हो।
कुम्भ का अनुभव मेरे लिए बहुत ही सुखद रहा। यहाँ देश विदेश से आये पर्यटक से मिलकर उनकी संस्कृति,वेशभूषा,रीति-रिवाज इत्यादि के बारे मे जानकर बहुत अच्छा लगा।
सिंहस्थ कुम्भ का सबसे बड़ा आकर्षण "किन्नर अखाड़ा" है। जिस शानदार तरीके से उनकी पेशवाई हुई उसे लफ्जों में बयाँ करना शायद मेरे बस की बात नही।अब किन्नरों को सामाजिक रूप से स्वीकारने का समय आ गया है। उन्हें भी समाज के मुख्यधारा में शामिल किया जाना चाहिए।
सिंहस्थ में विभिन्न प्रकार के नागा साडुबआये हैं। इन नागा साधुओं से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं । इनकी सबसे बड़ी चीज़ जो कि मुझे प्रभावित किया वो है इनकी कर्तव्यपरायणता ,गुरु के प्रति निष्ठा और आम लोगों के प्रति निश्छल प्रेम। ये साधु बड़ा कठिन जीवन जीते हैं। इनका जीवनशैली ऊर्जा से ओतप्रोत होता है।
अब तक हम केवल नागा पुरुष साधु से ही परिचित थे। लेकिन सिंहस्थ में पहली बार किसी नागा साध्वी के अखाड़े को पेशवाई करने का मौका मिला। इन नागा साध्वी को "अवधुतनि" कहा जाता है।
सिंहस्थ में वैसे तो सारा समय काफी आनंदमय रहा लेकिन सांध्यकालीन आरती का दृश्य इतना अद्भुत था कि पुरे दिन का थकान क्षण भर में गायब हो गया। क्या नजारा था ? चारों तरफ अत्याधुनिक लाइट्स से नहाया हुआ क्षिप्रा का तट ऐसा लग रहा था जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया है।
इस कुम्भ कि एक और खासियत मुझे जो मुझे अच्छा लगा वो यह कि इस कुम्भ में बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभीलोग पुरे जोश और भक्ति रस में डूबे हुए नजर आये।
यहाँ सभी धर्म ,जाति ,क्षेत्र के लोगों में जो सदभावना है वो दुनियां के किसी कोने में नही है। इस सद्भावना को कायम रखने के लिए मैंने भी खान चाचा की दुकान से हिंदी में अनुवादित कुरान ख़रीदा। साथ ही क्षिप्रा के किनारे स्थित गुरूद्वारे में लंगर का भी लुत्फ़ उठाया।
सिंहस्थ कुम्भ अभी तक के मेरे जीवन की सबसे बेहतरीन यात्रा है।यहाँ आकर मुझे वास्तविकता का ज्ञान हुआ। यहाँ से लौटने के बाद मै अपने आप को ज्यादा ऊर्जान्वित महसूस कर रहा हूँ। महाकुम्भ में स्नान करने के बाद ऐसा आत्मसुख प्राप्त हुआ जैसा पहले कभी नही हुआ था।
No comments:
Post a Comment