Wednesday, April 27, 2016

आगाज़ से अंजाम तक पहुंचाए निज़ाम

अभी कुछ दिनों से बिहार की टीआरपी आसमान छू रही है। सभी जगह लोग बिहार में चल रहे पूर्ण शराबबंदी की बातें कर रहे हैं। कुछ लोग बहुत खुश नज़र आ रहे हैं तो वहीं कुछ लोग निराश भी हैं। फेसबुक, ट्विटर और भी तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिहार शराबबंदी का मुद्दा गरम है। सभी लोग नीतीश कुमार के इस साहसिक कदम को काफी सराह रहे है। सुशासन बाबू का इतना बड़ा फैसला वाकई समाज में एक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। अब लग रहा है कि बिहार फिर से अपने समृद्ध इतिहास को पुनः जीवित करने की ओर अग्रसर हो रहा है। बदलाव की गति धीमी ही सही लेकिन सुचारू रूप से चल रहा है। पिछले कई वर्षों से धूमिल होता बिहार का आत्मसम्मान फिर से वापस मिलता नजर आ रहा है।

अब आग लगी है तो धुआँ तो उठेगा ही कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तराजू में तौलते हैं तो कुछ लोग मौलिक अधिकारों का हनन बता रहे हैं। एक समृद्ध  समाज के निर्माण के लिए जनविचार में एकरूपता होना परम आवश्यक है। नशा सामाजिक विघटन की जड़ है। इससे मुक्ति पाने के लिए जो भी कदम उठाये जाना चाहिये उसमे विलम्ब न हो तभी समाज एक सही दिशा में आगे बढ़ पायेगा।

बिहार अपने बुते देश को एक नया राह दिखा रहा है। यह वही बिहार है जिसकी गिनती आज भी पिछड़े राज्यों में की जाती है। समाज का सबसे खतरनाक जहर शराब को बैन कर नीतीश ने जो हिम्मत दिखाया है इसके लिये उनकी  जितनी तारीफ की जाये कम है।

राज्य सरकार शराब के द्वारा आने वाले राजस्व को त्याग कर किस प्रकार अपने राजस्व की क्षतिपूर्ति करेगी यह अनुमान लगा पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि शराब पर लगने वाले करों से सरकार को कइक हजार करोड़ राजस्व की प्राप्ति होती है। जिसका उपयोग करके सरकार कई तरह के योजनाओं का संचालन करती है।

चुनावी जंग मे विजय पताका फहराने के लिये भी अब शराबबंदी ब्रह्माश्त्र बन गया है । नेतागण अब कालाधन वापसी, गरीबी निवारण और बिजली पानी मुहैया कराने वाले नारों से कुछ कदम आगे बढ़कर पूर्ण शराबबंदी के नारे बुलंद कर रहे हैं।

खैर, जो भी हो, शराबबंदी का यह दौर थमना नहीं चाहिए। अब जब आगाज़ हो ही गया  है तो अंजाम तक भी पहुंचना ही चाहिये।

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