बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है सभी चौक चौराहों से लेकर गली मुहल्लों में बस एक ही सवाल सुनाई पड़ता है "अबकी बार किसकी सरकार? चाय की दुकान से लेकर बनिये की दुकान तक सिर्फ और सिर्फ चुनावी मंथन ही चलती है कुछ लोग जाति को महत्त्व देने की बात करते हैं तो वहीं कुछ बुद्धिजीवी व्यक्तित्व को महत्ता देते हैं ।ये तो रही आम जनता की बात अब बात करते हैं नेताओं की जो आजकल नये नये कुर्ते और बंन्डियों में सुसज्जित होकर लोगों के घर घर अपनी आत्मकथा गाते हैं जो कल तक बुढ़िया थी वो आज माँ बन गयी है ,जो कल तक एक अबला नारी थी वो तो मुँहबोली बहन बन गयी है, इस चुनाव के आ जाने से ना जाने कितने रिश्ते बन गए हैं ।चारों ओर का वातावरण "भाइयों एवम् बहनों" कि ध्वनि से गुंजायमान हो उठा है आखिर "ये रिश्ता क्या कहलाता है?" खैर! अभी इसका उत्तर देने में मै असमर्थ हुँ।अभी तो सभी नेतागण विनम्र ,शिष्ट ,कर्तव्यनिष्ठ ,ईमानदार तथा दयालु तो इतने हो गए हैं कि लोगों की पीड़ा देखकर अपने अश्रु रोक ही नही पाते ,ये नेता जब चुनावी प्रचार करने लोगों के घर जाते हैं तो अपनी प्रशंसा करते नहीं थकते या तो वे जनता को मुर्ख समझते हैं या फिर खुद को अवव्ल दर्जे का मुर्ख घोषित करने में लगे हैं।"जैसी करनी वैसी भरनी" मुहावरा इस चुनावी माहौल मे एकदम सटीक बैठता है मुझे तो यह समझ नही आता कि अगर किसी नेता ने सचमुच अच्छा काम किया है तो उसे प्रचार की क्या आवशयक्ता है उसके द्वारा किये गए काम मूर्त रूप से इस बात की पुष्टि कर देगा ।आज बिहार कि जनता यह तय नही कर पा रही है की वोट किसे दूँ? पार्टी को या विधायक उम्मीदवार को?
खैर! यह तो समय ही बताएगा कि बिहार की जनता किसे मुख्यमंत्री पद ग्रहण करने का सौभाग्य प्रदान करती है।
Wednesday, September 30, 2015
अबकी बार किसका बिहार?
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