Monday, September 28, 2015

ज़िन्दगी खत्म हो जायेगी पर पेपर नहीं

कद साढ़े तीन फुट,दुबला,पतला,रंग सावला,उम्र करीब आठ साल ,आँखें उदासी लिये और अपने काम में खूब माहिर, कुछ कहने को उत्सुक होंठ मानो सभी से कह रहा है कि यह काम मैं अपनी मर्ज़ी से नही बल्कि मजबूरन करने पर विवश हुँ।मैं बात कर रहा हुँ उस बच्चे कि जो रोज शाम को पेपर बेचकर अपना पेट पालता है।जहाँ एक ओर हम चाँद पर घर बसाने कि बात करते हैं वहीं दूसरी ओर धरती के नन्हें मुन्हे चाँद बेघर हैं ,क्या होगा इन बच्चों का जो पेट के चलते पेपर बेचने को विवश हैं?जिस उम्र में बाकि बच्चे अपने सुनहरे भविष्य की साख डालते हैं ,सपने संजोते हैं उस उम्र में यह मजदूरी कर अपना तथा अपने परिवार का पेट भरने में लगा हुआ है। कल  शाम को रास्ते से गुजरते वक़्त एक रुग्ण आवाज सुनाई पड़ी "पेपर बेचते बेचते ज़िन्दगी खत्म हो जायेगी लेकिन यह पेपर नहीं खत्म नही होंगे" मै वही पर ठहरा और देखा कि एक बच्चा हाथ मे पेपर लिए एक पेपर ले लेने कि गुज़ारिश कर रहा था मैंने उससे पूछा कि तुम ये क्यू करते हो ?तो उसने उल्टा मुझसे ही प्रश्न कर दिया कि आप पढाई क्यों करते हो? उसके इस प्रश्न में न जाने कितने सवाल और जवाब छिपे थे वह आठ साल का बच्चा पूरी रात मेरे स्मृतिपटल पर ठीक उसी स्वरुप में छाया रहा।देश मे न जाने कितने ऐसे बच्चे हैं जो मज़बूरी के कारण पढाई लिखाई से वंचित है और बाल मज़दूरी करने को विवश हैं । सरकार को इनके बारे अवश्य सोचना चाहिए यूँ बाल मजदूरी को कानूनन जुर्म करार देने मात्र से इन बच्चों का कल्याण नही हो पायेगा अपितु इन बच्चों के लिए पुनर्निवास तथा जीवन यापन करने हेतु उचित सामग्री मुहैया करानी चाहिए तभी कुछ हद तक बाल मजदूरी रुक पायेगी अन्यथा पेट के खातिर बाल मजदूरी होती ही रहेगी और बाल मजदूर मुक्त भारत एक स्वप्न बनकर ही रह जायेगा।

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