अमानव स्त्री-
मैं एक अमानव स्त्री हूँ लेकिन मानव मुझे पूजते हैं और मेरी सेवा करते हैं.मैं शुद्ध शाकाहारी खाना खाती हूँ लेकिन कई लोगों का मांसाहार हूँ. बचपन में मेरी माँ के दूध पर मुझसे ज़्यादा किसी और का हक़ था वो ही तय करते थे की मैं कितना दुध पियूँगी. मेरी माँ के वक्षस्थल को न जाने कितने लोग मिलकर सुबह शाम दुहते थे.मैं चुपचाप खड़ी एक बंधन में कैद अपनी माँ के वक्षों पर हुए आघातों से बने घाव को बस देखती रहती और अपनी गीली आँखों से अपनी भूख मिटाया करती.मेरी माँ ने मेरे से कहीं ज़्यादा उन दूध के सौदागरों के बच्चे को पाला और ये दूध के सौदागर वही मानव हैं जो हम अमानवों की पूजा करते हैं और हमें गौमाता कहकर पुकारते हैं.
स्त्री के बारे में मैथिशरण गुप्त ने सही कहा है -
“अबला तेरी हाय यही कहानी- आँचल में है दूध और आँखों में पानी”

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