Monday, December 3, 2018

क्या हिन्दू क्या मुसलमान


क्या हिन्दू क्या मुसलमान सब पुतले हैं मोम के
कब साम्प्रदायिकता में पिघल जाएं
हालात इतने पतले हैं कौम के
आज धर्म एक जंग लग रहा
कल वजूद के लिये तरसोगे
जिस धर्म के लिए लड़ाई किए तुमने
वो धर्म ढूंढते फिरोगे
फिर न कोई तेरा होगा
न कोई मेरा होगा
कलयुग कहो या कहो कयामत
जिस दिन आएगा सब खा जाएगा
फिर करते रहना मजहब और धर्म की बातें
इंसान तो रहोगे मगर इंसानों की तरह जीना भूल जाओगे।

~स्पर्श गौरव

Wednesday, August 8, 2018

पाकिस्तान चुनाव : सोने का नहीं, कांटों का ताज है पीएम की कुर्सी


 अब से बस कुछ दिन बाद पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर इमरान खान नए प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेंगे। उन्होंने चुनाव कैंपेनिंग के दौरान अपने कौम को एक 'नया पाकिस्तान' देने का वादा किया है । मौजूदा समय में पाकिस्तान भारी कर्ज में डूबा हुआ है, मुद्रास्फीति के कारण महंगाई आसमान छू रही है, दहशतगर्दी लगातार बढ़ती ही जा रही है, अपराध के मामले दिन-प्रतिदिन नए रिकॅार्ड कायम कर रही है और वैश्विक स्तर पर भी पाकिस्तान की साख पर लगातार सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं । ऐसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक हालात में इमरान खान के सामने कई मुश्किलें हैं जिन्हें दुरुस्त करना उनके लिए एक गंभीर चुनौती है।



पाकिस्तान में 1970 में पहली बार आम चुनाव हुआ जिसमें शेख मुजीबउर्र रहमान की पार्टी अवामी लीग को सबसे अधिक सीट जीतने के बावजूद सरकार बनाने नहीं दिया गया। सैन्य ताकतों के सामने पाकिस्तान का तंत्र कमज़ोर पड़ गया और यह चुनाव महज एक प्रतियोगिता साबित हुआ। इसके बाद से पाकिस्तान की सियासी हालात बिगड़ती चली गई और 1971 में पूर्वी पाकिस्तान एक नया राष्ट्र बांग्लादेश बनकर विश्व के मानचित्र पर स्थापित हुआ।


सैन्य शक्तियों का दबदबा शुरुआत से ही पाकिस्तान की राजनीति का अहम हिस्सा रहा है। ऐसा माना जाता है कि जिसे सैन्य समर्थन हासिल है उसे सत्ता में आने से कोई नहीं रोक सकता। इस बार के चुनाव में भी इमरान खान पर सेना का समर्थन हासिल होने का आरोप तमाम विपक्षी पार्टियों ने लगाया, 2013 के चुनाव में इमरान खान ने यही आरोप नवाज़ शरीफ पर भी लगाया था।




पाकिस्तान के इस आम चुनाव में इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ़ नेशनल असेम्बली के 272 सीटों में से 116 सीटें जीतकर देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। इस चुनाव में जहां नवाज़ शरीफ की पार्टी को सिर्फ 64 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा, वहीं पीपीपी केवल 43 नशीस्तों पर ही अपनी कामयाबी दर्ज करवा पाई। पाक के नेशनल असेंबली में कुल 342 सीटें हैं जिनमें से 272 सीटें जनरल और 60 सीटें महिलाओं और अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित होते हैं।




इस बार के पाकिस्तान के आम चुनाव पिछले सालों में हुए चुनावों के मुकाबले कई मायनों में अलग था क्योंकि इसी चुनावी माहौल के बीच पनामा पेपर केस की सुनवाई हुई जिसमें पाकिस्तान के पूर्व PM नवाज शरीफ को 10 साल और उनकी बेटी मरियम नवाज को 7 साल की सजा सुनाई गई। जिसके बाद से नवाज शरीफ की पार्टी पीएमएल (एन) पूरी तरह से नेतृत्वहीन हो गई और इसका सीधा फायदा पीटीआई को पहुंचा।



यहां किसी भी पार्टी को सरकार बनाने के लिए 172 सीटों की जरूरत होती है लेकिन इस आंकड़े के आसपास भी कोई पार्टी नहीं पहुंच पायी। हालांकि पीटीआई ने दावा किया है कि वो ये संख्या जुटा लेगी लेकिन इस जादूई आंकड़े तक पहुंचना इतना आसान भी नज़र नहीं आता।




जहां एकतरफ पीटीआई सरकार बनाने के लिए सियासी जोड़-तोड़ की गणित सुधारने में लगी है वहीं दूसरी तरफ विपक्षी पार्टियां चुनाव में धांधली का आरोप लगा रही है साथ ही फिर से चुनाव कराने की मांग कर रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इमरान खान किन दलों के साथ मिलकर अपना प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा करते हैं।





पिछले एक साल से राजनीतिक उथल-पुथल के कारण पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लगातार गिरती ही चली जा रही है। डाॅलर के मुकाबले पाकिस्तानी रुपया काफी कमजोर हो गया है। आज एक अमरीकी डाॅलर लगभग 123 पाकिस्तानी रूपए के बराबर है। ऐसी अटकलेंं भी लगाई जा रही हैं कि पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का दरवाजा खटखटा सकता है। मीडिया में ये खबर आते ही अमेरिका के विदेश मंत्री माईक पाॅम्पियो का बयान सामने आया जिसमें उन्होंने आईएमएफ को पाकिस्तान को कर्ज देने को लेकर चेताया और सोच-समझकर फैसला लेने की बात कही। हालांकि पाकिस्तान की तरफ से अभी तक आईएमएफ को आर्थिक मदद के लिए कोई आधिकारिक पत्र नहीं भेजा गया है।




पिछले कुछ सालों में भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में काफी कड़वाहट आई है।सर्जिकल स्ट्राइक और कुलभूषण जाधव का मामला इन दो सालों में काफी चर्चित रहा।अभी भी पाकिस्तान की ओर से लगातार युद्ध विराम का उल्लंघन हो रहा है। भारत के साथ संबंधों को लेकर इमरान खान कितने गंभीर हैं ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन कुछ बेहतर और सकारात्मक कदम वो उठाएंगे कम से कम इतनी उम्मीद तो हम कर ही सकते हैं।







Wednesday, January 24, 2018

अमानव स्त्री


अमानव स्त्री-

मैं एक अमानव स्त्री हूँ लेकिन मानव मुझे पूजते हैं और मेरी सेवा करते हैं.मैं शुद्ध शाकाहारी खाना खाती हूँ लेकिन कई लोगों का मांसाहार हूँ. बचपन में मेरी माँ के दूध पर मुझसे ज़्यादा किसी और का हक़ था वो ही तय करते थे की मैं कितना दुध पियूँगी. मेरी माँ के वक्षस्थल को न जाने कितने लोग मिलकर सुबह शाम दुहते थे.मैं चुपचाप खड़ी एक बंधन में कैद अपनी माँ के वक्षों पर हुए आघातों से बने घाव को बस देखती रहती और अपनी गीली आँखों से अपनी भूख मिटाया करती.मेरी माँ ने मेरे से कहीं ज़्यादा उन दूध के सौदागरों के बच्चे को पाला और ये दूध के सौदागर वही मानव हैं जो हम अमानवों की पूजा करते हैं और हमें गौमाता कहकर पुकारते हैं.

स्त्री के बारे में मैथिशरण गुप्त ने सही कहा है -

“अबला तेरी हाय यही कहानी- आँचल में है दूध और आँखों में पानी”

Monday, January 22, 2018

लॉस्ट आइडेंटिटी..


 भारत में गाय किसी के लिए पूजनीय है तो किसी के मुंह का निवाला तो किसी के लिए वोट बैंक।हिन्दू धर्म में गाय को सभी पशुओं  में सबसे श्रेष्ठ और पवित्र  माना गया है। भारत में गाय को माँ का दर्ज़ा दिया गया है क्योंकि गाय का दूध माँ के दूध के समान ही पौष्टिक होता है. आज के सन्दर्भ में देखें तो यह सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला एक राजनैतिक पशु है. जो पहले धार्मिक मान्यताओं के कारण जाना जाता था आज वह राजनीति का अखाड़ा तैयार करने के लिए मशहूर है.यह अहिंसक पशु होते हुए भी समाज के लिए हिंसक होता जा रहा है.गाय के नाम पर आये दिन दंगे फसाद होते रहते हैं. आज गाय धर्म और राजनीति की एक नई हथियार बन चुक है.जिस गाय का दूध मानसिक विकास में सहायक होता है आज वही गाय कुछ लोगों के मानसिक विकृति का कारण बन गय है. प्राचीन समय में जो गाय की पहचान थी वह आज कहीं धूमिल हो चुकी है .अतः  अब हमें गाय पर लड़ने की बजाय उसकी खोयी हुई पहचान वापस दिलाने की अधिक जरूरत है.







Wednesday, April 27, 2016

आगाज़ से अंजाम तक पहुंचाए निज़ाम

अभी कुछ दिनों से बिहार की टीआरपी आसमान छू रही है। सभी जगह लोग बिहार में चल रहे पूर्ण शराबबंदी की बातें कर रहे हैं। कुछ लोग बहुत खुश नज़र आ रहे हैं तो वहीं कुछ लोग निराश भी हैं। फेसबुक, ट्विटर और भी तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर बिहार शराबबंदी का मुद्दा गरम है। सभी लोग नीतीश कुमार के इस साहसिक कदम को काफी सराह रहे है। सुशासन बाबू का इतना बड़ा फैसला वाकई समाज में एक बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। अब लग रहा है कि बिहार फिर से अपने समृद्ध इतिहास को पुनः जीवित करने की ओर अग्रसर हो रहा है। बदलाव की गति धीमी ही सही लेकिन सुचारू रूप से चल रहा है। पिछले कई वर्षों से धूमिल होता बिहार का आत्मसम्मान फिर से वापस मिलता नजर आ रहा है।

अब आग लगी है तो धुआँ तो उठेगा ही कुछ लोग इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तराजू में तौलते हैं तो कुछ लोग मौलिक अधिकारों का हनन बता रहे हैं। एक समृद्ध  समाज के निर्माण के लिए जनविचार में एकरूपता होना परम आवश्यक है। नशा सामाजिक विघटन की जड़ है। इससे मुक्ति पाने के लिए जो भी कदम उठाये जाना चाहिये उसमे विलम्ब न हो तभी समाज एक सही दिशा में आगे बढ़ पायेगा।

बिहार अपने बुते देश को एक नया राह दिखा रहा है। यह वही बिहार है जिसकी गिनती आज भी पिछड़े राज्यों में की जाती है। समाज का सबसे खतरनाक जहर शराब को बैन कर नीतीश ने जो हिम्मत दिखाया है इसके लिये उनकी  जितनी तारीफ की जाये कम है।

राज्य सरकार शराब के द्वारा आने वाले राजस्व को त्याग कर किस प्रकार अपने राजस्व की क्षतिपूर्ति करेगी यह अनुमान लगा पाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि शराब पर लगने वाले करों से सरकार को कइक हजार करोड़ राजस्व की प्राप्ति होती है। जिसका उपयोग करके सरकार कई तरह के योजनाओं का संचालन करती है।

चुनावी जंग मे विजय पताका फहराने के लिये भी अब शराबबंदी ब्रह्माश्त्र बन गया है । नेतागण अब कालाधन वापसी, गरीबी निवारण और बिजली पानी मुहैया कराने वाले नारों से कुछ कदम आगे बढ़कर पूर्ण शराबबंदी के नारे बुलंद कर रहे हैं।

खैर, जो भी हो, शराबबंदी का यह दौर थमना नहीं चाहिए। अब जब आगाज़ हो ही गया  है तो अंजाम तक भी पहुंचना ही चाहिये।

Monday, April 25, 2016

यात्रा वृत्तांत : सिंहस्थ की पावन यात्रा

भोपाल से 191 किमी दूर उज्जैन में इस बार आस्था का महापर्व 'कुम्भ' लगा है। इस महाकुम्भ में लगभग पंद्रह हजार नागा व साधू संत सम्मिलित हुए हैं।शुक्रवार को प्रथम शाही स्नान के साथ ही सिंहस्थ महाकुम्भ का आगाज हो गया।तक़रीबन  10 लाख लोगों  ने अमृतमयी क्षिप्रा में पहला शाही स्नान किया। इस महाकुम्भ में 13 अखाड़ों के साधु संत हिस्सा ले रहे हैं।

मोक्षदायिनी क्षिप्रा में एक डुबकी लगाने के लिए लाखों लोगों का हुजूम उज्जैन की धरती को सुशोभित कर रहा है।
अगर बात करें प्रसाशनिक चाक-चौबंद की तो वह काबिल-ए-तारीफ है। भोपाल से लेकर उज्जैन तक बहुत कड़ी सिक्योरिटी है। चप्पे चप्पे पर पुलिस की पैनी  नज़र है।

महाकाल की नगरी उज्जैन में  "हर हर महादेव" की गूंज से मेरे कान तृप्त हो रहे थे। यहाँ की प्रत्येक वस्तु शिव के भक्ति में लीन नजर आती है। माँ क्षिप्रा के तट पर आठ मुख्य घाट हैं - त्रिवेणी घाट, रामघाट,मंगलनाथ,गऊघाट,भूखीमाता,सिद्धवट घाट,नृसिंह घाट एवं ऋणमुक्तेश्वर। सभी घाटों की अपनी अपनी विशेषता है।

घाटों पर सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए तैराकी बल भी तैनात किये गए हैं।इतना ही नहीं सभी घाटों पर एक निश्चित सीमा के अंतराल पर बैरियर लगाये गए हैं ताकि किसी भी प्रकार की अप्रिय घटना न हो।

कुम्भ का अनुभव मेरे लिए बहुत ही सुखद रहा। यहाँ देश विदेश से आये पर्यटक से मिलकर उनकी संस्कृति,वेशभूषा,रीति-रिवाज इत्यादि के बारे मे जानकर बहुत अच्छा लगा।

सिंहस्थ कुम्भ का सबसे बड़ा आकर्षण "किन्नर अखाड़ा" है। जिस शानदार तरीके से उनकी पेशवाई हुई  उसे लफ्जों में बयाँ करना शायद मेरे बस की बात नही।अब किन्नरों को सामाजिक रूप से स्वीकारने का समय आ गया है। उन्हें भी समाज के मुख्यधारा में शामिल किया जाना चाहिए।

सिंहस्थ में विभिन्न प्रकार के नागा साडुबआये हैं। इन नागा साधुओं से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं । इनकी  सबसे बड़ी चीज़ जो कि मुझे प्रभावित किया वो है इनकी कर्तव्यपरायणता ,गुरु के प्रति निष्ठा और आम लोगों के प्रति निश्छल प्रेम। ये साधु बड़ा कठिन जीवन जीते हैं। इनका जीवनशैली ऊर्जा से ओतप्रोत होता है।

अब तक हम केवल नागा पुरुष साधु  से ही परिचित थे। लेकिन सिंहस्थ में पहली बार किसी नागा साध्वी के अखाड़े को पेशवाई करने का मौका मिला। इन नागा साध्वी को "अवधुतनि" कहा जाता है।

सिंहस्थ में वैसे तो सारा समय काफी आनंदमय रहा लेकिन सांध्यकालीन आरती का दृश्य इतना अद्भुत  था कि पुरे दिन का थकान क्षण भर में गायब हो गया। क्या नजारा था ? चारों तरफ अत्याधुनिक लाइट्स से नहाया हुआ क्षिप्रा का तट ऐसा लग रहा था जैसे स्वर्ग धरती पर उतर आया है।

इस कुम्भ कि एक और खासियत मुझे जो मुझे अच्छा लगा वो यह कि इस कुम्भ में  बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभीलोग पुरे जोश और भक्ति रस में डूबे हुए नजर आये।

यहाँ सभी धर्म ,जाति ,क्षेत्र के लोगों में जो सदभावना है वो दुनियां के किसी कोने में नही है। इस सद्भावना को कायम रखने के लिए मैंने भी खान चाचा की दुकान से हिंदी में अनुवादित कुरान ख़रीदा। साथ ही क्षिप्रा के किनारे स्थित गुरूद्वारे में लंगर का भी लुत्फ़ उठाया।

सिंहस्थ कुम्भ  अभी तक के मेरे जीवन की सबसे बेहतरीन यात्रा है।यहाँ आकर मुझे वास्तविकता का ज्ञान हुआ। यहाँ से लौटने के बाद मै अपने आप को ज्यादा ऊर्जान्वित महसूस कर रहा हूँ। महाकुम्भ में स्नान करने के बाद ऐसा आत्मसुख प्राप्त हुआ जैसा पहले कभी नही हुआ था।

Saturday, February 27, 2016

आज के दौर में शिक्षा

शिक्षा  समाज की एक ऐसी ज़रूरत है जिसकी पूर्ति पैसों के बल नहीं की जा सकती।चाहे बात हो समुद्र में गोते लगाने की या आसमान में उड़ने की, शिक्षा के बिना आज मनुष्य कुछ भी नहीं कर सकता है।यह शिक्षा ही है जो मनुष्य को मानवता का पाठ  पढ़ाता है।लेकिन आज शिक्षा की पद्धति व पढाने के तौर तरीकों में काफी परिवर्तन आ गया है।पहले जहाँ शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन करना था वहीं आज के परिदृश्य में यह केवल आजीविका के लिये अनिवार्य साधन हो गया है।
संयुक्त राष्ट्रसंघ के एक अध्ययन के मुताबिक दुनियां भर में करीब चार अरब लोग साक्षर हैं  तथा 77.5 करोड़ लोग निरक्षर हैं।निरक्षर लोगों में से दो तिहाई महिलाएं हैं।यानि महिलाएं आज भी उन पुरानी परंपरा से आगे नहीं बढ़ पायी है जो कि चिंता का विषय है।
अगर भारत की बात करें तो 2011 में किये गए सर्वेक्षण के मुताबिक साक्षरता दर 74.4% है जिसमे पुरुष साक्षरता दर 82.16% एवं महिला साक्षरता दर 65.46% है।
एक अनुमान के अनुसार भारत में करीब 28.7 करोड़ लोग पढ़ना लिखना नहीं जानते हैं जो कि विश्व के आबादी का 37% है।यह आंकड़े साफतौर से भारत की शिक्षा व्यवस्था की पोल खोल रहा है।
आज भारत में शिक्षा की गुणवत्ता में भी भारी कमी आ गयी है जिसका सर्वप्रमुख कारण शिक्षा का बाजारीकरण है।आज गली मुह्हलों में किराने की दुकान से ज्यादा शिक्षण दुकान मिल जाते हैं।देश में न जाने कितने प्राइवेट संस्थान ऐसे हैं जिनका सिर्फ एक मकसद लोगों की जेब काटना है। विभिन्न प्रकार के प्राइवेट संस्थान अपने भ्रामक विज्ञापन के ज़रिये लोगों को अपने जाल में फंसाती है।इनमे इंजीनियरिंग और मेडिकल के संस्थान प्रमुख हैं ये संस्थान भ्रम का घटाटोप पैदा कर लोगों को लूटने का काम करती है।शिक्षण संस्थानों में यूँ शिक्षा का हो रहे व्यापार को रोकने के लिए सरकार को कोई ठोस कदम उठानी चाहिए और साथ ही विभिन्न प्रकार के कोर्स के लिए भिन्न भिन्न तरह के मानक राशि तय कर देनी चाहिए ताकि प्राइवेट संस्थानों में हो रहे लूट को कम किया जा सके और शिक्षा की हो रही बाजारीकरण में सेंध लगाया जा सके।